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हिंदी साहित्य का इतिहास : hindi sahitya ka itihas in hindi

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास 

'नमस्कार ' दोस्तों आज हम बात करने वाले है हिंदी पद्य साहित्य के बारे ,इसका विकास तथा इसे कितने भागों में बांटा गया है आज हम उन सब के बारे में बात करेंगे। 
हिंदी साहित्य का इतिहास , हिंदी साहित्य का परिचय
हिंदी साहित्य 


आधुनिक कल -

भारतेन्दु हरिश्चंद्र का परिचय , भारतेन्दु हरिश्चंद्र की रचनाएँ
भारतेन्दु हरिश्चंद्र 


आधुनिक हिंदी कविता का प्रारंभ विक्रम संवत 1900 से मन जाता है यह कल अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है इस कल में हिंदी साहित्य का चारो और विकास हुआ। इस काल में धर्म, दर्शन, कला एवं साहित्य सभी के प्रीति नए दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ। यह कल हिंदी साहित्य की अनेक प्रवृतिओं एवं परिवर्तनों को लेकर उपस्थित हुआ। हिंदी साहित्य के इस युग भारत में राष्ट्रीयता के बीज अंकुरित होने लगे थे। 
आधुनिक हिंदी कविता के विकासक्रम को विद्वानों ने अनेक प्रकार से विभाजित किया है , किन्तु सर्वमान्य इस विकास को निम्न भागों में बांटा जा सकता है। 

भारतेन्दु युग 

भारतेन्दु युग को आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस युग के कवियों में नवीन के प्रीति मोह साथ ही प्राचीन के प्रीति आग्रह भी था। ईस्वी सन 1850 से 1900 तक की कविताओं पर भारतेन्दु हरिश्चंद्र का गहरा प्रभाव पड़ा। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ही आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह है। भारतेन्दु युग नवजागरण का युग है। इसमें नई सामाजिक चेतना उभरकर आई। भारतेन्दु युग में देशभक्ति और राजभक्ति तत्कालीन राजनीती का अभिन्न अंग थी। जिसका प्रभाव इस युग के कवियों पर स्पष्ट देखा जा सकता है। भक्तिकालीन ,रीतिकालीन परम्पराएं भारतेन्दु युग के काव्य में देखीं जा सकती है तो आधुनिक नूतन विचार एवं भाव भी आपकी कविताओं में देखे जा सकते है। 

भारतेन्दु युगीन काव्य की विशेषताएं 

1. राष्ट्रीयता की भावना। 
2. सामाजिक चेतना का विकास। 
3. हास्य व्यंग्य। 
4. अंग्रेजी शिक्षा नीति का विरोध। 
5. विभिन्न काव्य रूपों का प्रयोग। 
6. काव्यानुवाद की परम्परा। 

भारतेन्दु युग के प्रमुख कवि तथा कविताएं 

1. भारतेन्दु हरिश्चंद्र - प्रेम सरोवर ,प्रेम फुलवारी ,वेणुगीति ,प्रेम मल्लिका। 
2. बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन - जीर्ण जनपद ,आनंद अरुणोदय ,लालित्य लहरी। 
3.प्रताप नारायण मिश्रा - प्रेम पुष्पावली ,मन की लहर ,श्रृंगार  विलास। 
4. जगमोहन सिंह -प्रेम संपत्ति लता ,देवयानी ,श्यामा सरोजिनी। 
5.अम्बिका दत्त व्यास - भारत धर्म ,हो हो होरी ,पावस पचासा। 
6. राधाचरण गोस्वामी - नवभक्त मल। 

द्विवेदी युग -

महावीर प्रसाद द्विवेदी का परिचय ,महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनाये
महावीर प्रसाद 


यह युग कविता में खड़ी बोली प्रितिष्ठित होने का युग है। इस युग के प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी है। सन 1900 से 1920 तक पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी का पूरा प्रभाव रहा। इस युग को इसलिए द्विवेदी युग कहते है। इन्होने "सरस्वती" नामक पत्रिका का संपादन किया। उन्होंने ने इस पत्रिका में ऐसे लेखों का प्रकाशन किया जिन्होंने नवजागरण का सन्देश जान - जान तक पहुँचाया। आपकी प्रेरणा से ब्रजभाषा हिंदी कविता से हटती गई तथा खड़ी बोली ने उसका स्थान ले लिया। 

द्विवेदी युगीन कविताओं की विशेषताएं 

1. देशभक्ति 
2. अंधविश्वासों का तथा रूढ़ियों का विरोध। 
3. वर्णन प्रधान कविताएँ। 
4. मानव प्रेम। 
5. प्रकृति चित्रण। 
6. खड़ी बोली का परिनिष्ठित रूप। 

द्विवेदी युग के प्रमुख कवि एवं कविताएँ 

1. अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध - प्रिय प्रवास ,वैदेही वनवास , चुभते चौपदे , रसकलश। 
2. मैथलीशरण गुप्त - पंचवटी , जयद्रथ वध , भारत भारती ,साकेत ,यशोधरा। 
3. रामनरेश त्रिपाठी - मिलन , पथिक , स्वप्न , मानसी। 
4. माखनलाल चतुर्वेदी - हिमकिरीटनी ,हिमतरंगनी , युगचरण ,समर्पण 
5. महावीर प्रसाद द्विवेदी - काव्य मंजूषा , सुमन। 

छायावाद 

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय , जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ
जय शंकर प्रसाद 


हिंदी साहित्य के आधुनिक चरण में द्विवेदी युग के पश्चात् हिंदी काव्य की जो धारा विषय वस्तु की दृष्टि से स्वच्छंद प्रेमभावना ,प्रकृति में मानवीय क्रियाकलापों तथा भाव व्यापारों के आरोपण और कला की दृष्टि से लाक्षिणीकता प्रधान नवीन अभिव्यंजना पद्धति को लेकर चली उसे छायावाद कहा गया। 

छायावादी काव्य की विशेषताएं 

1. व्यक्तिवाद की प्रधानता। 
2. श्रृंगार भावना। 
3. प्रकृति का मानवीकरण। 
4. सौन्दर्यानुभूति। 
5. वेदना एवं करुणा का आधिक्य। 
6. अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम। 
7. नारी के प्रति नवीन भावना। 
8. जीवन-दर्शन। 
9. अभिव्यंजना शैली। 

प्रमुख छायावादी कवि एवं उनकी रचनाएँ 

1. जयशंकर प्रसाद - कामायनी , लहर , आंसू , झरना। 
2. सुमित्रानंदन पंत - पल्लव ,ग्रंथि ,गुंजन , वीणा , उच्छवास। 
3. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला - परिमल ,गीतिका ,अनामिका ,तुलसीदास। 
4. महादेवी वर्मा - रश्मि ,नीरजा ,नीहार ,सांध्यगीत। 
5. रामकुमार वर्मा - निशीथ ,चित्र रेखा , आकाशगंगा। 

प्रगतिवाद 

महाकवि नागार्जुन का परिचय , नागार्जुन की रचनाएँ
महाकवि नागार्जुन 


प्रगतिवाद भौतिक जीवन से उदासीन आत्मनिर्भर , सूक्ष्म ,अंतर्मुखी प्रवृत्ति  के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ,लोक के विरुद्ध स्थूल जगत की तार्किक प्रतिक्रिया है। प्रगतिवाद का प्रेरणा स्रोत मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है सामाजिक चेतना और भावबोध काव्य का लक्ष्य है। प्रगतिवादी चेतना के बीज छायावाद में ही पल्ल्वित होने लगे थे किन्तु तीसरे और चौथे दशक में प्रगतिशील आंदोलन ने काव्य को सामाजिकता की और उन्मुख किया। 

प्रगतिवादी काव्य की विशेषताएं 

1. शोषकों के प्रति विद्रोह और शोषितो से सहानुभूति। 
2. आर्थिक एवं सामाजिक समानता पर बल। 
3. नारी शोषण के विरुद्ध मुक्ति का स्वर। 
4. ईश्वर के प्रति अनाश्थ ा। 
5. सामाजिक यथार्थ का चित्रण। 
6. प्रतीकों का प्रयोग। 
7. भाग्यवाद की अपेक्षा कर्मवाद की श्रेष्ठता पर बल। 

प्रगतिवादी कवि और उनकी रचनाये 

1. नागार्जुन - युगधारा , सतरंगे पंखों वाली , प्यासी पथराई आँखें। 
2. केदारनाथ अग्रवाल - युग की गंगा , फूल नहीं रंग बोलते है।,नींद के बादल। 
3. शिवमंगल सिंह सुमन - हिल्लोल ,जीवन के गान ,प्रलय सृजन , विश्वास बढ़ता ही गया। 
4. त्रिलोचन - धरती ,मिट्टी की बारात ,मैं उस जनपद का कवि हूँ। 
5. रांगेय राघव - अजेय खण्डहर ,मेधावी ,पांचाली ,राह के दीपक। 
6.सुमित्रानंदन पंत - युगवाणी ,ग्राम्या। 
7. कुकुरमुत्ता। 

प्रयोग वाद 

गजानन माधव मुक्तिबोध का परिचय ,गजानन माधव मुक्तिबोध  की रचनाएँ
गजानन माधव मुक्तिबोध 


हिंदी में प्रयोग वाद का प्रारंभ सन 1943 में अज्ञेय  के संपादन में प्रकाशित तारसप्तक से माना जा सकता है। इसकी भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है -ये कवि नवीन राहों के अन्वेषी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् अज्ञेय के सासंपादन में प्रतीक मासिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। उसमे प्रयोगवाद का स्वरुप स्पष्ट हुआ। जीवन के प्रति विभिन्न कुंठाओ ने प्रयोगवादी कवी को शंकाकुल एवं भयाकुल बना  दिया है  कवि  बहुत कुछ कहना चाहता है। परन्तु कुछ कह नहीं पता। जीवन की यह घुटन इस वर्ग की कविताओं में व्याप्त है। 

प्रयोगवादी काव्य की विशेषताएं 

1. नवीन उपमानो का प्रयोग। 
2. प्रेमभावनाओ का खुला चित्रण। 
3. बुध्दिवाद की प्रधानता। 
4. निराशावाद की प्रधानता। 
5. लघुमानव वाद की प्रतिष्ठा।
6. अहं की प्रधानता। 
7. रूढ़ियों की प्रति विद्रोह। 
8. मुक्त छंदों का प्रयोग। 
9. व्यंग्य की प्रधानता। 

प्रयोगवादी कवि एवं उनकी विशेषताएं 

1. अज्ञेय -हरी घास पर क्षण भर ,इत्यलम , इंद्रधनुष ये रोंदे हुए। 
2. मुक्तिबोध - चाँद का मुँह टेढ़ा है , भूरी -भूरी खाक धूल। 
3. धर्मवीर भारती - अंधायुग , कनुप्रिया , ठंडा लोहा। 
4. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना - बांस के पल , एक सूनी नाव , काठ की घंटी। 
5. नरेश मेहता - संशय की एक रात , वन पाँखी। 
6. गिरिजा कुमार माथुर - धूप के धान , शिला पंख चमकीले , नाश और निर्माण। 
7. भारत भूषण अग्रवाल - ओ अप्रस्तुत मन।
 


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