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सिकंदर कौन था : Who was great Alexander

कौन था सिकंदर महान : History of Alexander

इतिहास में सिकन्दर अथवा अलेक्जेंडर कुशल तथा यशश्वी वीर योद्धा माना  गया है। सिकंदर अपनी मृत्यु तक दुनिया की उस तमाम भूमि को जीत चूका था जिसकी जानकारी प्राचीन ग्रीक लोगो को थी। इसलिए सिकंदर को विश्व विजेता तथा सिकंदर महान के नाम  जाना जाता था। तो चलिए जानते है कौन  है सिकंदर तथा इतिहास में इसकी क्या भूमिका है। 

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सिकंदर का परिचय 

सिकंदर का जन्म 20 जुलाई 356 ईसा पूर्व को यूनान के मकदूनिया में हुआ था। जो वर्तमान में मैसिडोनिया के नाम  जाना जाता है। सिकंदर के पिता का नाम फिलिप था तथा माता का नाम क़्वीन ओलिम्पिया था। सिकंदर को अलेक्जेंडर तृतीय , अलेक्जेंडर दी ग्रेट तथा अलेक्जेंडर मेसिडोनियन के नाम से भी जाना जाता था। 


सिकंदर के द्वारा लड़े गए युद्ध 

सिकंदर को शुरूआती युध्द एक गणराज्य के शासक के साथ लड़ना पड़ा जिसे यूनानी रस्टीज कहते है उसे ने सिकंदर का विरोध किया था।  इस वीर सरदार ने अपने नगरकोट पर यूनानियों की घेरेबंदी का पुरे तीस दिन मुकाबला किया और अंत में लड़ता हुआ मारा गया। उसी प्रकार आश्वायन तथा आश्वकायन भी पूरे दम खम के साथ लड़े।  जैसा कि इस बात से पता चला की उनके कम से कम 40 हजार सैनिक बंदी बना लिए गए थे। उनकी आर्थिक समृद्धि का आंकड़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस लड़ाई में 230000 बैल सिकंदर के हाथ लगे थे। 


सिकंदर का शासन का क्षेत्र 

सिकंदर ने अपने युद्ध काल में ईरान , सीरिया , मिस्र  , फिनीशिया , गाझा , मेसोपोटेमिया , जुदेआ , बैक्ट्रिया और भारत में पंजाब तक के प्रदेश में     विजय हासिल की थी। सिकंदर ने सबसे पहले ग्रीक राज्यों पर अपनी विजय स्थापित की।  तथा फिर वह एशिया के माइनर आधुनिक    तुर्की की ओर कूच कर दिया।  तत्कालीन समय उस क्षेत्र पर फारस का शासन था। फ़ारसी साम्राज्य मिस्र से लेकर पश्चिमोत्तर भारत     तक फैला हुआ था। फारस के सरदार दारा तृतीय  को सिकंदर ने अलग - अलग तीन युद्धों में  पराजित किया।  लेकिन सिकंदर की तथाकथित    " विश्वविजय " फारस विजय अधिक नहीं थी। सिकंदर को शाह दारा के अलावा अन्य स्थानीय प्रांतपालों से भी युद्ध करना पड़ा। 


सिकंदर का भारत में आगमन 

पुरु अपने पिता की मृत्यु के बाद मद्र देश का राजा बन गया। तथा वो भारत के मानचित्र को सामने रखकर दिग्विजय की इक्षा कर रहा था। उसी लक्ष्य को लेकर महाराजा पुरु ने कुछ सेना लेकर उत्तरी कश्मीर की ओर प्रस्थान किया और उस ओर के सारे प्रांतों पर विजय प्राप्त कर सिंध की तरफ प्रस्थान किया। उसी उसी समय फारस के विजेता सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया। जिस समय सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया उस समय भारत की भारत की राजनीतिक व्यवस्था अच्छी नहीं थी।  तथा भारत कई स्वतंत्र राज्यों में बंटा था।  तथा कुछ रियासतों में बांटा था जो राजा - महाराजाओं के अधीन थीं। उत्तर भारत में सबसे प्रसिद्ध रियासत मगध थी जिसे महाजनपद कहते थे। यह विशाल राज्य उत्तर पश्चिम में सतलुज नदी के पूर्वी घाट तक गंगा - यमुना की घाटी में फैला हुआ था जिसकी राजधानी पटना ( पाटलिपुत्र ) थी। यहां पर नन्द वंश शासन करता था। इसके पास विशाल सेना थी। लेकिन जब सिकंदर  आक्रमण किया तो युद्ध के लिये कोई सामने नहीं आया। 

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सिकंदर ने अटक से 16 मील दूर ओहिद नामक स्थान पर अपना शिविर बनाया और एक पत्र तक्षशिला के नरेश आम्भी को पत्र लिखा और आम्भी ने इस बात पर सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली की वह उसे मद्र  देश का राजा बनाएगा। सिकन्दर ने एक पत्र महाराजा पुरु को भेजा लेकिन  उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया की वो सिकंदर से युद्ध क्षेत्र में मिलेंगे। इस पत्र को पढ़कर सिकंदर उत्साहित हो गया क्योंकि उसने उसके गुरु अरस्तु से भारत की प्रशंसा सुनी थी। लेकिन सिकंदर को झेलम की बाढ़ तथा पुरु के हाथियों ताक़त सिकंदर को सता रही थी। इधर पुरु ने झेलम के तट पर अपनी सेना लगा दी। तथा जहां से सिकंदर के झेलम पार करने की सम्भावना थी वहां खुद तैनात हो गए। सिकंदर के द्वारा झेलम पार करना असंभव दिखा तो उसने छल का प्रयोग किया और घोषणा कर दी की युद्ध बरसात के बाद होगा। जिससे महाराज पुरु निश्चिन्त हो गए। इधर सिकंदर ने पुरु की सेना की तैनाती से कुछ मील दूर जहां झेलम में मोड़ था वहां से सैनिक पार कराने का प्रयास किया। जब यह खबर पुरु को लगी तो उन्होंने अपने बेटे को वहां भेजा। पुरु के बेटे वहां जाकर देखा की सिकंदर की सेना बीच झेलम में फँसी हुई है। तो उन्होंने उस सेना पर हमला नहीं किया। से सबसे बड़ी गलती पुरु के बेटे ने की नहीं तो सिकंदर वहीं से भाग जाता। जब सिकंदर की सेना ने झेलम को पार कर लिया और युद्ध शुरू हो गया जब यह पता पुरु को चला की सिकंदर झेलम पार कर चूका है तब तक उनका पुत्र वीरगति को प्राप्त हो गया था। इसके बाद सिकंदर तथा पुरु के बीच युद्ध हुआ जिस में पुरु की सेना के आगे सिकंदर की सेना टिक न सकी तथा सिकंदर को कुछ सैनिकों के साथ नाव से झेलम पार करके भागना पड़ा।  जब भागते हुए सिकंदर को तक्षशिला के राजा आम्भी ने रोका और युद्ध  का हाल जाना। सिकंदर ने कहा की पुरु के हाथियों के आगे हमारी सेना बेदम है। तब आम्भी ने कहा की में पुरु के हाथियों को सम्हाल लूंगा। इसके बाद सिकंदर तथा पुरु के बीच फिर से युद्ध हुआ जिसमे महाराज पुरु ने अपने दम से सिकंदर के पसीने छुड़ा दिए। अंत पुरु के कंधे पर घाव लग गया जिससे वे मूर्छित हो गए और सिकंदर ने झूठी घोषणा कर दी की पुरु मारा गया।  जिससे पुरु की सेना भागने लगी। लेकिन सिकंदर इस छणिक विजय से खुश तो हुआ। और युद्ध एक दिन के लिए टाला गया।  इसके बाद सिकंदर महाराजा पुरु की वीरता से भयभीत था। तथा कई राजदूत महाराज पुरु से संधि के लिए भेजे। लेकिन महाराज पुरु ने मना कर दिया। अंत में महाराज पुरु के मित्र द्वारा सिकंदर तथा पुरु के बीच संधि हुई जिसमे सिकंदर ने महाराज पुरु से सम्मान जनक तथा वीर योद्धा की तरह व्यवहार किया और हार मानकर यूनान वापस लौटा। 


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सिकंदर की भारत से वापसी 

 मगध के राजा घनानन्द ने चाणक्य का साथ देने इ इंकार कर दिया तथा चाणक्य का अपमान किया।  चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को साथ लेकर मगध साम्राज्य की स्थापना की। और सिकंदर द्वारा जीते गए राज्य पंजाब में सेल्यूकस को हराया तथा चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस की पुत्री से विवाह किया। सिकंदर जब सिंधु नदी के मार्ग से भारत से वापस लौट रहा था।  अगलस्सोई लोगो ने सिकंदर का जमकर सामना किया। इस युद्ध में सिकंदर चोटिल हो गया। लेकिन अंत विजय सिकंदर की हुई।  इसके बाद सिकन्दर का एक गण ने और सामना किया। और उन्होंने  देश व धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। 
323 ईसा पूर्व में सिकंदर भारत की भूमि छोड़ बेबीलोनिया चला गया , जहां उसकी तैंतीस वर्ष की अल्पायु में मृत्यु हो गई। 

 

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