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ब्याजस्तुति अलंकार , ब्याजनिन्दा अलंकार , विशेषोक्ति अलंकार

 ब्याजनिन्दा , ब्याजस्तुति ,व्यतिरेक , विभावना आदि अलंकार की परिभाषा। 

नमस्कार दोस्तों आज हम अनुप्रास , उत्प्रेक्षा अलंकार को सीखने  बाद अब हम ब्याजस्तुति , ब्याजनिन्दा ,विशेषोक्ति आदि अलंकारों के बारे में जानेंगे। 

ब्याजस्तुति  अलंकार की परिभाषा 



जब कथन में देखने और सुनने में निंदा सी जान पड़े किन्तु वास्तव में प्रशंसा हो वहां ब्याजस्तुति अलंकार होता है। 
जैसे - 
1     गंगा क्यों टेढ़ी चलती हो ,
     दुष्टों को शिव कर देती हो। 


2   आढ़ी टेढ़ी उग्र नर्मदा , दुष्टों  को भी तार रही। 
   नरक रिक्त कर , सलिल स्वर्ग भर ,कंकर शंकर धार रही। 


3   जमुना तुम अविवेकनि , कोन लियो यह ढंग। 
  पापिन से जिन बंधु को, मान करावत भांग। 

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ब्याजनिन्दा अलंकार 

जहां कथन में स्तुति का आभास हो किन्तु वास्तव में निंदा हो , वहां ब्याजनिन्दा अलंकार होता है। 
जैसे -
  1    राम साधु , तुम साधु सयाने। 
       राम मातु भलि सब पहिचाने। 


2    तुम तो सखा श्यामसुंदर के ,
         सकल जोग के ईश। 




विशेषोक्ति अलंकार 

जब कारण होते हुए  भी कार्य नहीं होता वहां विशेषोक्ति अलंकार होता है। 
जैसे -
  1    मूरख हृदय न चेत। 
    जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम। 

2    नेह न नैनन को कछु उपजी बड़ी बलाय। 
      नीर भरे नित प्रति रहे तउ न प्यास बुझाय। 


व्यतिरेक अलंकार 

जब काव्य में उपमान की अपेक्षा उपमेय को बड़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है , वहां व्यतिरेक अलंकार होता है। 
जैसे -
 1    सम  सुबरन सुखमाकर सुखद न थोर। 
       सीय अंग सखि कोमल कनक कठोर।। 


2    उसकी मुखड़ा के आगे ,
      कलानिधि फीका लागे। 


अन्योक्ति अलंकार 

जहां पर कोई बात सीधे न कहकर किसी के सहारे की जाये वहां अन्योक्ति अलंकार होता है। 
जैसे -
  1   माली आवत देखकर कलियन करि पुकार। 
      फुल्हे -फुल्हे चुन लिए , काल्हि हमारी बारि। 


2   जिन-जिन देखे वे कुसुम , गई सुविति बहार। 
    अब अति रही गुलाब में , अपत कटीली डार। 


अपन्हुति अलंकार 

अपन्हुति का अर्थ है निषेध करना।  काव्य में जहां उपमेय को निषेध कर उपमान का आरोप किया जाता है वहां अपन्हुति अलंकार होता है। 
जैसे -
 1   सत्य कहहूँ हों दीन दयाला। 
    बंधु न होय मोर यह काला। 


2   अंग - अंग जारती अरि , तीछन ज्वाला जाल। 
     सिंधु उठी बड़वाग्नि यह , नहीं इंदु भव - भाल। 


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विभावना अलंकार 

जहां कारण  के न होने पर भी कार्य का होना पाया जाता है वहां विभावना अलंकार होता है। 
जैसे -
  1   बिनु पद चले सुने बिनु काना ,
      कर बिनु कर्म करे विधि नाना। 
 


2    मूक होय वाचाल पंगु चढ़ै गिरिवर गहन। 
    जासु कृपा सु दयाल द्रबाहु सकल कलिमलि दहन। 


उदाहरण अलंकार 

काव्य में जहां एक कथन के लिए दूसरे कथन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाये।  वहां वहां उदाहरण अलंकार होता है। 
जैसे -
      नयना देय बताय सब , हिय को हेत अहेत। 
      जैसे निर्मल आरती , भली बुरी कह देत।। 



दृष्टान्त अलंकार 

जहाँ काव्य में एक ही बात या भाव की दो बातें कही जाएँ या उदाहरण देकर समझाया जाय , वहां दृष्टान्त अलंकार होता है। 
जैसे -
  1   जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग। 
        चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग।। 


2     ओछे नर के पेट में रहे न मोटी बात। 
      आध सेर के पात्र में कैसे सेर समात।। 



भ्रांतिमान अलंकार 

जहाँ प्रस्तुत को देखकर किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाता है वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है। 
जैसे -
 1    देखकर सहसा हुआ शुक मौन है  
     सोचता है यह अन्य शुक कौन है। 


2  पांव महावर दें को नाइन बैठी आय ,
   पुनि-पुनि जानि महावरी एड़ी भीजत जाय। 


संदेह अलंकार 

जहाँ समानता के कारण अनिश्चय की स्थिति बनी रहती वहां संदेह अलंकार होता है। 
जैसे - 
  1     सारी बीच नारी है की नारी बीच सारी है ,
       सारी है की नारी है , नारी है की सारी है।

2    विरह है या वरदान है। 


विरोधाभास अलंकार 

जहां वास्तव में भी विरोध न होने पर भी विरोध का आभास हो वहां विरोधा भास अलंकार होता है। 
जैसे -
  1    आई ऐसी अद्भुत बेला ,
      न रो सका न हँस सका। 


2 सुनहुँ देव रघुवीर कृपाला ,
   बंधु न होय यह मोर कृपाला। 



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धन्यवाद। 

       



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